गुरु तपन कुमार मिश्रा:
आत्मीयता और ज्ञान का जीवंत सफर
- शिष्य डॉ.सुनील गुलाबसिंग जाधव
किनवट की वह
हरियाली, सागवान के घने जंगल और सरस्वती विद्या मंदिर महाविद्यालय के प्रवेश द्वार पर खड़े वे जवान होते ताड़ के पेड़... आज भी जब आँखें मूँदता हूँ, तो 30 साल पुराना वह मंजर किसी फिल्म की तरह चलने लगता है। गुरु तपन कुमार
मिश्रा जी की सेवा-निवृत्ति के इस पड़ाव पर, स्मृतियों के
गलियारे से कुछ यादें, संवाद और दृश्य आपके सामने हैं।
1. जब अंग्रेजी की 'मछलियां' हिंदी के सागर में मिल गईं :
कॉलेज के शुरुआती दिन थे। मैं अपने उन दोस्तों के साथ कॉलेज के पास वाले नाले पर बैठा था, जिनका विषय 'अंग्रेजी' था। हम बहते निर्मल पानी में ऊपर की ओर छलांग लगाती मछलियों को देख रहे थे। तभी एक दोस्त ने मुझसे अंग्रेजी में एक सामान्य सा सवाल पूछा। मैं चुप रह गया। वह हंसकर बोला, "अरे! तुझे अंग्रेजी नहीं आती तो तूने यह विषय क्यों लिया?" मैंने झेंपते हुए कहा, "यार, मेरे बड़े भाई ने एडमिशन करवाया था, तो बस ले लिया। मुझे क्या पता था यहाँ कोई पढ़ाने वाला ही नहीं है।" (तबतक अंग्रेजी के लिए कोई अध्यापक नियुक्त नहीं हुआ था ) दोस्त ने सलाह दी, "देख भाई, अभी भी वक्त है। हिंदी या मराठी में से कोई विषय चुन ले। चल, आज हिंदी की क्लास देखते हैं।" मैं अनमने मन से हिंदी की कक्षा में पहुँचा। वहाँ एक प्रभावशाली व्यक्तित्व खड़ा था-लंबा कद, अनिल कपूर स्टाइल बाल और रौबीली मूंछें। जैसे ही उन्होंने बोलना शुरू किया, मैं मंत्रमुग्ध हो गया। मिश्रा सर ने पूछा, "बेटा, नए आए हो? क्या नाम है?" मैंने धीरे से कहा, "जी सर, विषय बदलना चाहता हूँ।" वे मुस्कुराए और बोले, "हिंदी की इस मधुर वाणी में तुम्हारा स्वागत है। एक बार इसकी मिठास चख ली, तो कहीं और जाने का मन नहीं करेगा।" और सचमुच, उस दिन के बाद मैं कभी कहीं और नहीं गया।
2. धूप, पेड़ और 'रस' की निष्पत्ति
:
सर्दियों के दिन थे, किनवट की ठंड मशहूर थी। हम सब क्लास में ठिठुर रहे थे। मिश्रा सर कक्षा में आए और बोले, "इतनी ठंड में शब्दों का आनंद नहीं आएगा। चलो, आज प्रकृति के सानिध्य में चलते हैं।" वे हमें कॉलेज के बगीचे के एक कोने में ले गए। तभी रास्ते में एक नए नियुक्त हुए अध्यापक मिल गए। उन्होंने आश्चर्य से पूछा, "मिश्रा सर, पूरी फौज लेकर कहाँ की तैयारी है?" सर ने हंसकर जवाब दिया, "आज धूप की गर्माहट में इन बच्चों को 'रस' पिलाना है।" वह अध्यापक भी उत्सुक हो गए, "सर, मुझे भी 'रस सिद्धांत' कभी समझ नहीं आया। क्या मैं भी छात्र बनकर बैठ सकता हूँ?" सर ने कहा, "अवश्य! बस शर्त यह है कि अध्यापक का मुखौटा बाहर छोड़ कर आना होगा।" उस दिन पेड़ के नीचे बैठकर सर ने जब सूत्र समझाया- "विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्ति..." तो लगा मानो सरस्वती स्वयं उनके कंठ में विराजमान हैं। उन्होंने कहा, "बेटा, जब तक विभाव और अनुभाव का मिलन नहीं होगा, आनंद की अनुभूति नहीं होगी।" वह पाठ मेरे मस्तिष्क पर स्वर्ण अक्षरों में छप गया।
3. मूंछ की शर्त: एक भाषाई
युद्ध :
एक बार कॉलेज से घर लौटते समय रास्ते में एक बोर्ड लगा था, जिस पर 'मंदिर' लिखा था। मिश्रा सर और मराठी के मार्तंड कुलकर्णी सर के बीच उस शब्द की वर्तनी (Spelling) को लेकर बहस छिड़ गई। मिश्रा सर गरजे, "कुलकर्णी जी, यह वर्तनी गलत है। हिंदी के व्याकरण से यह अशुद्ध है!" कुलकर्णी सर भी कम नहीं थे, उन्होंने कहा, "मिश्रा जी, मराठी के हिसाब से यह बिल्कुल सही है।" मिश्रा सर ने अपनी मूंछों पर ताव देते हुए कहा, "शर्त लगा लीजिए! अगर मैं गलत हुआ, तो यह मूंछ मुंडवा लूँगा!" कुलकर्णी सर हंसकर बोले, "छात्रों! गवाह रहना, कल मिश्रा जी की मूंछ दांव पर लगी है।" अगले दिन दोनों अपने-अपने शब्दकोश लेकर आए। बहस का अंत बड़े ही सुखद मोड़ पर हुआ। सर ने हमसे कहा, "बच्चों, देखा आपने? भाषा का अपना भूगोल होता है। मराठी का 'मंदिर' अपनी जगह सही है और हिंदी का अपनी जगह। पर इस बहस ने हमें यह तो सिखा दिया कि अपनी भाषा के प्रति समर्पण कैसा होना चाहिए।"
4. माँ की ममता और एक बेटे
का संकल्प :
एक शाम मैं जीएस (General Secretary) के काम से सर के कमरे पर गया। वे उस समय अकेले रहा करते थे। अंदर गया तो देखा सर फोन पर किसी से बात कर रहे हैं और उनकी आँखों से आंसू बह रहे हैं। मैंने घबराकर पूछा, "सर, क्या हुआ? सब ठीक तो है?" उन्होंने रुंधे गले से कहा, "माँ की तबीयत ठीक नहीं है। घर से बहुत दूर हूँ, बस उनकी चिंता खाए जा रही है।" कुछ देर बाद जब वे शांत हुए, तो मैंने माहौल बदलने के लिए उनकी माँ की तस्वीर देखी और पूछा, "सर, माँ के गले में यह सोने का हार (गंठन) बहुत सुंदर है।" सर की आँखों में एक चमक आ गई। वे बोले, "पता है, यह मैंने अपनी पहली कमाई से उन्हें दिलाया था। एक बेटे के लिए इससे बड़ा सुख क्या होगा कि वह अपनी माँ की इच्छा पूरी कर सके।" उस दिन सर ने मुझे बिना किसी किताब के 'मातृ-भक्ति' का सबसे बड़ा पाठ पढ़ा दिया।
5. गुरु का साथ: आज भी और
हमेशा :
कुछ साल पहले की बात है, मैं भूषण के पद पढ़ा रहा था- "इंद्र जिमि जंभ पर..."। मुझे अर्थ समझने में कठिनाई हो रही थी। मैंने संकोच करते हुए सर को फोन लगाया। मैंने कहा, "सर, एक पद में फंस गया हूँ। समझ नहीं आ रहा छात्रों को क्या बताऊं?" सर ने बस इतना कहा, "चिंता मत कर, मैं अभी देखता हूँ।" पाँच मिनट में फोन कट गया। मुझे लगा शायद सर व्यस्त होंगे। पर तभी व्हाट्सएप पर एक संदेश आया। सर ने अपने हाथ से पूरा अर्थ और विश्लेषण लिखकर भेजा था। नीचे एक छोटा सा नोट था- "अब निडर होकर पढ़ाओ, तुम एक अच्छे शिक्षक हो।" तपन कुमार मिश्रा सर केवल एक शिक्षक नहीं, बल्कि एक चलता-फिरता विश्वविद्यालय हैं। उन्होंने हमें सिर्फ हिंदी नहीं पढ़ाई, बल्कि हिंदी को 'जीना' सिखाया। उनकी सेवानिवृत्ति केवल एक आधिकारिक प्रक्रिया है, क्योंकि एक गुरु कभी सेवा-मुक्त नहीं होता। वह तो अपने शिष्यों की सफलता में हमेशा जीवित रहता है। सर, आपके चरणों में सादर नमन!
5. चुनौती:
देवनागरी हस्ताक्षर और 'साहब' का दफ्तर
:
जब मैं जनरल
सेक्रेटरी (GS) बना, तो तपन मिश्रा सर ने मुझे अपने
केबिन में बुलाया। उनके बैठने का अंदाज ही ऐसा था कि सामने वाला खुद को ऊर्जा से
भरा महसूस करें। उन्होंने अपनी मूंछों को सहलाते हुए कहा, "बेटा, पद मिला है तो कुछ ऐसा करो जो यादगार बन जाए।
घिसे-पिटे कार्यक्रम तो सब करते हैं, तुम 'देवनागरी लिपि हस्ताक्षर प्रतियोगिता' करवाओ।" मैंने अचरज से पूछा, "सर, इसमें क्या खास होगा?" वे कुर्सी पर थोड़ा
आगे झुके और बोले, "खासियत यह होगी कि तुम्हें किनवट
के बड़े अधिकारियों और प्रतिष्ठित लोगों के पास जाना होगा। उनसे कहो कि वे अपनी
मातृभाषा और देवनागरी में हस्ताक्षर करें। यह तुम्हारी संवाद कला की परीक्षा भी
होगी और हिंदी का सम्मान भी।" मैं चुनौती स्वीकार
कर सबसे पहले पुलिस अधीक्षक (SP) के दफ्तर पहुँचा। खाकी
वर्दी का रौब देख पहले तो गला सूख गया। SP साहब ने कड़क आवाज
में पूछा, "हाँ भई, कैसे आना
हुआ?" मैंने हिम्मत जुटाकर कहा, "सर, मैं सरस्वती महाविद्यालय का जीएस हूँ। हमारे
गुरु तपन कुमार मिश्रा जी के मार्गदर्शन में हम देवनागरी हस्ताक्षर अभियान चला रहे
हैं। हम चाहते हैं कि शहर के प्रथम हस्ताक्षर आपके हों।" साहब का चेहरा अचानक नरम पड़ गया। वे मुस्कुराए और बोले, "मिश्रा जी के छात्र हो? बहुत नेक काम है। आजकल तो
लोग अंग्रेजी के आड़े-तिरछे दस्तखत में अपनी पहचान खो रहे हैं। लाओ, कहाँ हस्ताक्षर करने हैं?"
इसी तरह जब मैं SBI बैंक मैनेजर के पास पहुँचा, तो उन्होंने पहले मुझे संदेहास्पद नजरों से देखा और बोले, "तुम मेरा सिग्नेचर क्यों चाहते हो? कहीं इसका गलत इस्तेमाल तो नहीं करोगे?" मैंने शांत होकर जवाब दिया, "सर, यह केवल देवनागरी की सुंदरता और जागरूकता के लिए है।" तभी उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने कहा, "माफ करना बेटा, सुरक्षा की आदत है। पर सच कहूँ तो बरसों बाद किसी ने हिंदी में हस्ताक्षर मांगे हैं। यह लो!" जब मैं हस्ताक्षरों का वह पुलिंदा लेकर सर के पास पहुँचा, तो उन्होंने मेरी पीठ पर जोर से धौल जमाई और कहा, "शाबाश! जो काम दिया जाए उसे पूरा करना ही एक अच्छे नेता का गुण है। भविष्य में यही तुम्हारी सफलता की कुंजी बनेगी।"
6. 'आनंद
नगरी': वह स्टॉल और गुरु का मार्गदर्शन :
किनवट के उस इलाके के
लिए 'आनंद नगरी' एक बिल्कुल नया शब्द था। जब
सर ने यह विचार रखा, तो हम छात्र असमंजस में थे। मैंने पूछा,
"सर, यह क्या होता है? क्या हमें सामान बेचना होगा?" मिश्रा सर ने
विस्तार से समझाया, "आनंद नगरी यानी खुशियों का शहर।
यहाँ तुम व्यापार भी सीखोगे और टीम वर्क भी। तुम अपना एक स्टॉल लगाओ, जिसमें कुछ ऐसा हो जो सबको अपनी ओर खींचे।"
हमने लड़के-लड़कियों का एक ग्रुप बनाया और तय किया कि हम 'होटल'
(खाद्य पदार्थों का स्टॉल) चलाएंगे। तैयारी के दौरान सर हर स्टॉल पर
जाकर बारीकियाँ देख रहे थे।
वे हमारे स्टॉल पर आए और बोले, "सिर्फ चाय-नाश्ता बेचना काफी नहीं है। तुम्हारी मुस्कुराहट और बोलने का लहजा ऐसा होना चाहिए कि ग्राहक वापस आए। और याद रखना, स्वच्छता ही सबसे बड़ा विज्ञापन है।" उस दिन कड़ाके की ठंड थी। हमने 'गरमा-गरम चाय और पकौड़े' का स्टॉल लगाया। जैसे ही भीड़ बढ़ी, हम घबराने लगे। तभी सर वहां से गुजरे और बोले, "घबराओ मत, बस सेवा भाव रखो। देखो, तुम्हारी चाय की खुशबू पूरे मैदान में फैल रही है।" उस दिन हमारा स्टॉल सबसे ज्यादा कमाई करने वाला स्टॉल बना। शाम को जब पुरस्कारों की घोषणा हुई, तो हमारे ग्रुप को प्रथम पुरस्कार मिला। मिश्रा सर ने पुरस्कार देते समय धीरे से कान में कहा, "देखा! गुरु की बात मानोगे और मेहनत करोगे, तो दुनिया तुम्हारी मुट्ठी में होगी।" वह एक जीत नहीं थी, बल्कि आत्मविश्वास की पहली सीढ़ी थी।
7. पचौंदा गाँव की वह सुबह: जब गुरु दोस्त बन गए :
एनएसएस (NSS) कैंप
के दौरान सुबह 7 बजे जब सब सोकर उठे ही थे, तपन सर वहां पहुँच गए। हमने पचौंदा गाँव के उस प्रसिद्ध मंदिर और कमल के
तालाब पर जाने का मन बनाया था, जो वहां से 5 किलोमीटर दूर था। जैसे ही हम निकलने लगे, सर ने पूछा,
"कहाँ की तैयारी है टोली?" हमने
झिझकते हुए कहा, "सर, पचौंदा गाँव जा रहे हैं मंदिर देखने।" सर ने उत्साह से कहा,
"अरे! फिर मुझे क्यों छोड़ रहे हो? चलो,
मैं भी चलता हूँ।" हम सब दंग रह गए।
एक प्रोफेसर हमारे साथ 5 किलोमीटर पैदल चलेगा? लेकिन उस 50 मिनट की पैदल यात्रा में सर ने हमें
जीवन के वे पाठ पढ़ाए जो कक्षाओं में संभव नहीं थे। तालाब के किनारे पहुँचकर जब
हमने मंदिर की सीढ़ियों को छूते पानी और उगते सूरज की किरणों में चमकते कमलों को
देखा, तो सर बोल उठे, "देखो
बच्चों, यह प्रकृति ही सबसे बड़ी शिक्षिका है। जैसे यह कमल
कीचड़ में रहकर भी ईश्वर को अर्पित होता है, वैसे ही तुम भी
कठिन परिस्थितियों में रहकर अपनी चमक बनाए रखना।" उस
अद्भुत नजारे को हमने अपने कैमरों में तो कैद किया ही, पर सर
की वे बातें हमारे चरित्र का हिस्सा बन गईं।
तपन कुमार मिश्रा सर, आपने
हमें केवल किताबी ज्ञान नहीं दिया, बल्कि जीवन जीने की कला
सिखाई। आपने हमें सिखाया कि हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि
हमारी पहचान और हमारा गौरव है। आज आपकी सेवा-निवृत्ति पर हम सभी छात्र आपकी दी हुई
सीख को मशाल बनाकर आगे बढ़ रहे हैं।
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