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संघर्ष से सरोकार तक : जीवन के अनेक रंगों को स्वर देता काव्य-संसार धिरज बालासाहेब पावड़े के काव्य-संग्रह ‘विश्वास ढलने नहीं दूँगा’ का पुस्तक-परीक्षण

संघर्ष से सरोकार तक : जीवन के अनेक रंगों को स्वर देता काव्य-संसार
धिरज बालासाहेब पावड़े के काव्य-संग्रह ‘विश्वास ढलने नहीं दूँगा’ का पुस्तक-परीक्षण


    किसी भी काव्य-संग्रह की वास्तविक पहचान केवल उसके शीर्षक से नहीं होती; उसकी असली पहचान उसके भीतर समाए विषयों की विविधता, कवि की संवेदना और अपने समय के साथ उसके संवाद से होती है। धिरज बालासाहेब पावड़े का काव्य-संग्रह ‘विश्वास ढलने नहीं दूँगा’ इसी दृष्टि से उल्लेखनीय है। अद्वैत प्रकाशन, दिल्ली से जुलाई 2026 में प्रकाशित इस संग्रह में साठ कविताएँ हैं। अनुक्रमणिका पर दृष्टि डालते ही स्पष्ट हो जाता है कि कवि ने स्वयं को किसी एक भावभूमि तक सीमित नहीं रखा है। आत्मसंवाद, संघर्ष, कर्म, सामाजिक विसंगतियाँ, ईमानदारी, न्याय, धर्म, कृषि, शिक्षा, श्रम, परिवार, संबंध और मानवीय मूल्यों जैसे अनेक विषय इस काव्य-संसार को व्यापक आयाम प्रदान करते हैं।
    संग्रह का शीर्षक ‘विश्वास ढलने नहीं दूँगा’ इसकी एक प्रमुख जीवन-दृष्टि को सामने लाता है, किंतु पूरा संग्रह पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि यह केवल आत्मविश्वास और प्रेरणा की कविताओं तक सीमित नहीं है। ‘कविता में अंतर्मन की गूँज’, ‘थोड़ी सी खुशियाँ…’, ‘लोग मेरे बारे में…’, ‘कहने दो लोगों को’, ‘कौन है?’, ‘ऐ जिंदगी’, ‘बस सोच का फर्क है’, ‘आभारी हूँ’, ‘यकीन है’, ‘कौन हूँ मैं?’ जैसी कविताओं के शीर्षक कवि के आत्मसंवाद और अंतर्मुखी चिंतन की ओर संकेत करते हैं।

    कवि बाहरी दुनिया को देखने से पहले अपने भीतर उतरता हुआ दिखाई देता है। ‘अंतर्मन की गूँज’ और ‘कौन हूँ मैं?’ जैसे शीर्षक अस्तित्व और आत्मपहचान के प्रश्नों को जन्म देते हैं। मनुष्य अपने बारे में दूसरों द्वारा बनाई गई धारणाओं से कितना प्रभावित होता है और स्वयं को किस प्रकार पहचानता है—यह आधुनिक जीवन का महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। ‘लोग मेरे बारे में…’, ‘कहने दो लोगों को’ और ‘पहचान हमारी’ जैसे शीर्षक सामाजिक दृष्टि और व्यक्तिगत अस्मिता के बीच के तनाव की ओर संकेत करते हैं। यही इस संग्रह की एक विशेषता है कि कवि समाज को देखते हुए स्वयं को विस्मृत नहीं करता। बाहरी जगत और अंतर्मन के बीच का संवाद उसकी कविता में निरंतर दिखाई देता है।
    संग्रह में ‘विश्वास ढलने नहीं दूँगा’, ‘कर्म कर निरंतर…’, ‘बस अपना कर्म करो’, ‘बस कोशिश करने वालों की…’, ‘मिसाल बनो…’ जैसी कविताओं के शीर्षक कर्मप्रधान जीवन-दृष्टि को स्पष्ट करते हैं। यहाँ सफलता को केवल भाग्य से जोड़ने के बजाय प्रयत्न, निरंतरता और कर्म को महत्त्व दिया गया है। ‘कर्म कर निरंतर…’ और ‘बस अपना कर्म करो’ जैसे शीर्षकों से स्पष्ट होता है कि कर्म कवि के लिए केवल एक विषय नहीं, बल्कि जीवन को देखने का महत्त्वपूर्ण आधार है।
लेकिन यह कर्मवाद केवल व्यक्तिगत सफलता तक सीमित नहीं रहता। ‘कृषि प्रधान देश में’, ‘गोरख धंधा’, ‘हुनर चोरी हुआ है जिनका’, ‘बड़ा शौक है बेटा…’, ‘बाप नहीं मरता कभी’ जैसी कविताएँ सामाजिक और आर्थिक जीवन के विभिन्न पक्षों की ओर संकेत करती हैं। विशेष रूप से ‘हुनर चोरी हुआ है जिनका’ श्रम, कौशल और उसके उचित मूल्यांकन का प्रश्न उपस्थित करता है। समाज में कुछ लोगों के श्रम और प्रतिभा को सम्मान मिलता है, जबकि अनेक कुशल हाथ और प्रतिभाएँ उपेक्षित रह जाती हैं—यह सामाजिक विसंगति कवि की चिंता का विषय बनती दिखाई देती है।
    ‘कृषि प्रधान देश में’ भारतीय ग्रामीण जीवन और कृषि की वास्तविकताओं की ओर ध्यान आकर्षित करती है। भारत को कृषिप्रधान देश कहा जाता है, किंतु किसान और कृषि के सामने उपस्थित समस्याएँ इस गौरवपूर्ण विशेषण से कहीं अधिक जटिल हैं। इस शीर्षक के माध्यम से कवि उस विडंबना की ओर संकेत करता हुआ दिखाई देता है, जिसमें कृषि देश की अर्थव्यवस्था और जीवन का आधार होने के बावजूद किसान अनेक चुनौतियों से जूझता रहता है।
    संग्रह का सामाजिक सरोकार ‘आज के नाजुक दौर में’, ‘ईमानदारी की माँ’, ‘अविष्कार’, ‘बदनामी’, ‘इल्ज़ाम ’, ‘उपासना अंधी ठीक नहीं’, ‘गालियाँ देने लगे’, ‘मुखौटे सजाए बैठे हैं’ जैसी कविताओं से और व्यापक होता है।
‘उपासना अंधी ठीक नहीं’ जैसा शीर्षक धार्मिक आस्था के साथ विवेक की आवश्यकता को रेखांकित करता है। श्रद्धा और विवेक का संतुलन भारतीय सामाजिक जीवन में सदैव महत्त्वपूर्ण रहा है। वहीं ‘इल्ज़ाम ’ जैसा शीर्षक यह संकेत देता है कि कवि धार्मिक विषयों को भी अपनी काव्य-दृष्टि का हिस्सा बनाता है। ऐसे विषयों को संवेदनशीलता और व्यापक मानवीय दृष्टि के साथ देखना आवश्यक होता है।
    ‘ईमानदारी की माँ’ शीर्षक विशेष रूप से आकर्षक और प्रतीकात्मक है। ईमानदारी को ‘माँ’ के रूप में देखना एक ऐसी कल्पना है, जो ईमानदारी को केवल नैतिक उपदेश न मानकर जीवन को संस्कारित करने वाले मूल मूल्य के रूप में स्थापित करती है। आज जब व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में मूल्य-संकट की चर्चा होती है, तब ईमानदारी जैसे मूल्य पर कविता के माध्यम से विचार करना सार्थक बन जाता है।
    सामाजिक विसंगतियों को लेकर कवि की बेचैनी ‘मुखौटे सजाए बैठे हैं’, ‘गालियाँ देने लगे’, ‘बदनामी’, ‘क्या हो गया है इस दुनिया को?’ जैसी कविताओं के शीर्षकों में स्पष्ट दिखाई देती है। व्यक्ति का वास्तविक रूप और उसके द्वारा धारण किए गए सामाजिक मुखौटे, संवाद में बढ़ती कटुता तथा बदलते सामाजिक मूल्यों के प्रति असंतोष—इन सबकी संभावनाएँ इन शीर्षकों में दिखाई देती हैं। कवि समाज को केवल स्वीकार नहीं करता; वह उसे प्रश्नांकित भी करता है।
    इस संग्रह की एक भावपूर्ण भूमि नातों और स्मृतियों की है। ‘आभारी हूँ’, ‘स्मरण प्रवाहित होता है’, ‘अनमोल उपहार’, ‘बड़ा शौक है बेटा…’, ‘बाप नहीं मरता कभी’, ‘बस क्या दोस्त…’ जैसे शीर्षक कवि के भावनात्मक संसार को सामने लाते हैं। विशेष रूप से ‘बाप नहीं मरता कभी’ अत्यंत प्रभावशाली शीर्षक है। पिता की शारीरिक अनुपस्थिति के बाद भी उनकी स्मृतियाँ, संस्कार और जीवन-मूल्य संतानों के भीतर जीवित रहते हैं—यह सार्वभौमिक मानवीय अनुभूति इस शीर्षक में गहरी संवेदना के साथ उपस्थित है।
‘स्मरण प्रवाहित होता है’ और ‘बाप नहीं मरता कभी’ जैसी कविताएँ संग्रह को केवल संघर्ष और सामाजिक सरोकारों तक सीमित नहीं रहने देतीं, बल्कि उसमें भावनात्मक गहराई भी जोड़ती हैं। इससे कवि का संवेदनशील और आत्मीय पक्ष सामने आता है।
    संग्रह में शिक्षा, ज्ञान और कौशल के संदर्भ भी दिखाई देते हैं। ‘अध्ययन’, ‘अविष्कार’, ‘हुनर चोरी हुआ है जिनका’ जैसे शीर्षक मनुष्य के बौद्धिक विकास और कौशल के महत्त्व की ओर संकेत करते हैं। अध्ययन केवल परीक्षा और प्रमाणपत्र तक सीमित न रहकर व्यक्ति की विचार-क्षमता को विकसित करने वाला माध्यम बने—यह दृष्टि आज के समय में विशेष महत्त्व रखती है।
    इस काव्य-संग्रह की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में से एक है इसकी प्रश्नाकुलता। ‘कौन है?’, ‘कौन हूँ मैं?’, ‘क्या हो गया है इस दुनिया को?’, ‘तुम किस दुनिया जीते हो?’, ‘फिर क्या होता है?’, ‘फिर कौन समझ पाता है?’, ‘क्या सब कुछ ऐसा ही होगा?’, ‘ये क्या चल रहा है?’ जैसे शीर्षक लगातार प्रश्न उपस्थित करते हैं। ये प्रश्नचिह्न केवल भाषिक प्रयोग नहीं हैं; वे कवि के भीतर की बेचैनी और अपने समय को समझने की जिज्ञासा के प्रतीक हैं।
    कवि तैयार उत्तर देने के बजाय प्रश्नों के माध्यम से पाठक को विचार करने के लिए प्रेरित करता है। यही कारण है कि इन कविताओं का अनुभव केवल कवि तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पाठक भी उनके प्रश्नों में स्वयं को खोजने लगता है। प्रश्न करना ही विचार की पहली सीढ़ी है, और इस दृष्टि से यह संग्रह पाठक को निष्क्रिय नहीं रहने देता।
‘न्याय दो या…’ शीर्षक संग्रह में सामाजिक प्रतिरोध का स्वर सामने लाता है। न्याय की आकांक्षा मनुष्य की मूलभूत सामाजिक आवश्यकता है। अन्याय के सामने मौन रहने के बजाय प्रश्न उठाने की मानसिकता कवि की सामाजिक संवेदनशीलता को व्यक्त करती है। इसी क्रम में ‘कह दो ये मुश्किलों से…’, ‘मिल जाऊँगा मैं तुम्हें’ और ‘रोशनी वालों…’ जैसे शीर्षक संघर्ष के बीच आशा और आगे बढ़ने की दिशा का संकेत देते हैं।
    इस पूरे काव्य-संसार को जोड़ने वाला एक महत्त्वपूर्ण सूत्र है— व्यक्ति का खुद पर किया गया विश्वास। यह विश्वास अंधा या काल्पनिक नहीं, बल्कि संघर्ष, अनुभव और कर्म से निर्मित विश्वास है। इसलिए संग्रह का शीर्षक पूरे काव्य-संग्रह को एक अर्थपूर्ण वैचारिक चौखटा प्रदान करता है।
    समग्र रूप से देखा जाए तो ‘विश्वास ढलने नहीं दूँगा’ किसी एक विषय का काव्य-संग्रह नहीं है। यह मनुष्य के जीवन के अनेक पक्षों को स्पर्श करने वाला बहुआयामी संग्रह है। आत्मसंवाद से सामाजिक प्रश्नों तक, परिवार से कृषि तक, कर्म से धर्म तक, स्मृति से वर्तमान तक और निराशा से आशा तक इसकी कविताएँ अनेक भावभूमियों से होकर गुजरती हैं।
    धिरज बालासाहेब पावड़े के काव्य-संसार का महत्त्व इसकी विविधता में है—वे केवल भावनाएँ व्यक्त नहीं करते, बल्कि प्रश्न उठाते हैं, सामाजिक वास्तविकताओं को देखते हैं, मानवीय मूल्यों की तलाश करते हैं और मनुष्य की आंतरिक शक्ति में विश्वास व्यक्त करते हैं। उनकी कविता में जीवन से पलायन का स्वर नहीं, बल्कि जीवन की समस्या, अन्याय और शोषण से दो हात करने की चेतना दिखाई देती है।
     ‘विश्वास ढलने नहीं दूँगा’ केवल एक कविता या काव्य-संग्रह का शीर्षक नहीं, बल्कि संघर्षमय जीवन के प्रति कवि की प्रतिबद्धता का कथन है। परिस्थितियों के बदलने की प्रतीक्षा करने के बजाय अपने कर्म पर विश्वास रखना, सामाजिक विसंगतियों पर प्रश्न उठाना, संबंधों और स्मृतियों को सँजोना तथा मानवीय मूल्यों के प्रति आस्था बनाए रखना—इन सभी भावों का समन्वित काव्यात्मक रूप इस संग्रह में दिखाई देता है।
    इस दृष्टि से यह संग्रह पाठक को केवल कविता पढ़ने का अनुभव नहीं देता, बल्कि उसे स्वयं से भी कुछ प्रश्न करने के लिए प्रेरित करता है—मैं कौन हूँ? मैं किस पर विश्वास करता हूँ? मेरे आसपास के समाज में क्या घटित हो रहा है? और इस परिस्थिति में मेरी भूमिका क्या है?
    यही प्रश्नाकुलता, आत्मसंवाद, सामाजिक सरोकार और जीवन के प्रति अटूट आस्था ‘विश्वास ढलने नहीं दूँगा’ को उसकी विशिष्ट पहचान प्रदान करते हैं। यह संग्रह संघर्षों के बीच मनुष्य के भीतर जीवित रहने वाली उस लौ का काव्यात्मक दस्तावेज है, जो विपरीत परिस्थितियों में भी बुझना नहीं चाहती।

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